मित्रता की मिसाल रूस और भारत

भारत समेत अनेक पश्चिमी देशों के कुछ लोगों का यह मानना है कि भारत को पुतिन का साथ नहीं देना चाहिए। भारत को आजाद हुए 75 साल बीत गए लेकिन आज भी भारत के सामने हजारों चुनौतियां खड़ी हैं। युद्ध के दौरान भारतीय जवान दशकों पुरानी थ्री नॉट थ्री बंदूक के सहारे लड़ रहे थे, तो चीनी सैनिकों के पास मशीनगन थी। आज भारत को स्वतंत्र देश के रूप में बने रहने के लिए ढेर सारी समस्याओं से होकर गुजरना पड़ा है। अब भारत को सोचना है कि इस युद्ध में भारत को रशिया का साथ देना में अधिक फायदा है या अमेरिका और अन्य देशों का साथ देने में अधिक लाभ है। हम याद दिला दें की दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945 से 1990 तक पूरी दुनिया दो महा शक्तियों में बंट गई थी रूस और अमेरिका। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एक ही महाशक्ति रह गई अमेरिका। अमेरिका हमेशा से कूटनीति करता रहा अपनी दादागिरी दिखाता रहा। कहता रहा कि मैं स्वतंत्र देश का समर्थक हूं परंतु कभी भी अमेरिका ने खुलकर भारत का साथ नहीं दिया, चाहे वह चीन के साथ ही युद्ध की बात हो या पाकिस्तान के साथ। जब चीन ने गलवान के युद्ध में धोखे के साथ भारत पर हमला किया था। लद्दाख की गलवान घाटी में या फिर कारगिल युद्ध के वक्त जब भारत चाहता था कि सैटेलाइट की मदद से अमेरिका उसे पाकिस्तान में छिपे सैनिकों की लोकेशन बताएं, या अमेरिका उसे जी जीपीएस टेक्नोलॉजी दे तब अमेरिका ने साफ इनकार कर दिया था। भारत और चीन के 20 अक्टूबर, 1962 के युद्ध के समय रशिया ने कहा था कि भारत पर किसी भी प्रकार का हमला को रशिया पर किया गया हमला ही समझा जाएगा, जैसे कि हमें लगता है कि इस युद्ध के बाद एक ‘वर्ल्ड आर्डर’ उभरकर आएगा और पूरा विश्व कई फिर से कम से कम दो महाशक्तियों में विभाजित हो जाऐगा तब अमेरिका अकेला सुपर पावर नहीं होगा। इस ‘वर्ल्ड आर्डर’ में कई देश शामिल हो सकते हैं जैसे भारत, चीन, जर्मनी आदि और भारत इसमें सक्रिय भूमिका निभा सकता है तब अमेरिका अकेला सुपर पॉवर नहीं होगा। भारत रशिया का साथ नहीं देता है तो चीन के साथ भारत और चीन के किसी भी तरह के विवाद में रूस साथ नहीं देगा और स्वाभाविक तौर पर रूस का झुकाव चीन की और हो जाएगा जो भारत के लिए खतरनाक है। भारत चारों तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिरा हुआ है। ऐसे में रूस जैसा मित्र खोना भारत को महंगा पड़ेगा। ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स में देशों को उनकी संभावित सैन्य ताकत के आधार पर रैंक किया जाता है। इस साल 138 देशों की रैंकिंग को 50 मानकों के आधार पर निर्धारित किया गया। इसमें सैन्य संसाधन, प्राकृतिक संसाधन, उद्योग, भौगोलिक विशेषताएं और उपलब्ध मानव शक्ति शामिल हैं। भारत में 60% हथियार रशिया से ही आता है उन हथियारों को समय-समय पर रिपेयरिंग और स्पेयर पार्ट पुर्जा बदलना पड़ता है अगर रशिया उन हथियारों को रिपेयरिंग और पार्ट पुर्जा बदलने का काम का काम बंद कर देगा तो और उन हथियार में जंग लग जाएगा और बेकार हो जाएगा। भारत में हथियारों की कमी हो जाएगी। भारत के लिए आगे की बड़ी चुनौती है कि भारतीय मिसाइल टेक्नोलॉजी और न्यूक्लियर प्रोग्राम में रशिया की भूमिका अहम रही है। रशिया ने इन चीजों में भी हमारा साथ दिया है। परमाणु परीक्षण के वक्त भी रूस ने भारत का साथ बढ़चढ़ कर दिया था। भारत की सीमा से सटा है रूस की सीमा बाकी देश बहुत दूर बैठे हैं, ऐसे में चीन या पाकिस्तान के विरुद्ध हमारे विवाद में रूस ही हमारा साथ देगा न कि अमेरिका जो कि दूर बैठा कूटनीति चाल चलता रहता है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में एक ही महाशक्ति रह गई अमेरिका। अमेरिका हमेशा से कूटनीति करता रहा अपनी दादागिरी दिखाता रहा`। कहता रहा कि मैं स्वतंत्र देश का समर्थक हूं परंतु कभी भी अमेरिका ने खुलकर भारत का साथ नहीं दिया, चाहे वह चीन के साथ ही युद्ध की बात हो या पाकिस्तान के साथ। जब चीन ने गलवान के युद्ध में धोखे के साथ भारत पर हमला किया था।

डॉ. वंदना पालीवाल