नई लीला के राम

अयोध्या सजी थी, लाखों दीये जगमग थे, शंखध्वनियां और तुरही का नाद उठ रहा था। महामारी और आर्थिक तबाही का वह सन्नाटा शायद कहीं दुबक गया, जिससे देश त्रस्त है। अलबत्ता, अयोध्या वही है मगर 5 अगस्त के बाद उसके सुर-ताल कुछ दूसरे हो गए, या कहिए वहां विशाल राम मंदिर के लिए भूमि पूजन के भव्य आयोजन में सत्ता के इकबाल से उठी नगाड़ों की धुन नई लीला का मंच तैयार कर रही हैं, जिसका उद्घोष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वर से गूंजा। पहले साष्टांग दंडवत (कोई चाहे तो 2014 में पहली बार संसद में पहुंचे मोदी का घुटनों के बल बैठकर सिर झुकाना याद कर सकता है) और फिर भूमि पूजन के बाद मोदी ने मंच पर और वहां मौजूद चुनींदा दर्शकों-श्रोताओं लेकिन टीवी चैनलों के जरिए करोड़ों घरों में लोगों से कहा, 5 अगस्त भी 15 अगस्त की तरह अविस्मरणीय तिथि है, जब कई पीढियों का बलिदान फलीभूत हुआ। मंच पर मौजूदगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और श्रीराम तीर्थक्षेत्र न्यास के अगुआ नृत्यगोपाल दास की ही थी, जो नए राजनैतिक ताने-बाने का यकीनन संकेत लिए हुए है।

हरिमोहन मिश्र
गौरतलब है कि तकरीबन तीन दशक पहले राम मंदिर का आंदोलन का आगाज करने वाले और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के दौरान मौजूद रहे रथी, नायक, पटनायक, सभी लगभग दृश्य से गायब रहे। आप चाहें तो उनके नाम लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, कल्याण सिंह वगैरह के रूप में याद कर सकते हैं। यह भी अलग बात है कि 1989 में शिलान्यास के बाद दोबारा यह आयोजन किया गया मगर नींव नहीं रखी जा सकी क्योंकि मंदिर का नया नक्शा अभी मंजूर नहीं हो पाया है। लेकिन इन ब्यौरों और सुर्खियों से ज्यादा अहम वे सवाल है, जो इससे निकलती नई राजनीति की शिला रखते लग रहे हैं। इससे शायद ही कोई इनकार कर पाए कि 5 अगस्त की तारीख एक नई इबारत लिख गई। संभव है, मोदी सरकार ने इसे सुनियोजित तरीके से चुना है क्योंकि आजादी की लड़ाई की कम से कम दो बड़ी तवारीखें अगस्त के महीने की 9 और 15 हैं। 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ था और 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली थी। साल भर पहले 5 अगस्त को ही संविधान के अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाकर जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा हटा लिया गया और उसे दो केंद्रशासित राज्यों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया। उससे वहां खासकर घाटी में शुरू हुई नाकेबंदी, पाबंदियां, गिरμतारियां, कμर्यू साल भर बाद भी पूरी तरह हट नहीं पाई है। तो, कम से कम दो ऐसी घटनाएं 5 अगस्त को मोदी के नेतृत्व में हुईं, जिसे संघ परिवार और हिंदुत्ववादी संगठन आजादी का अधूरा एजेंडा मानते रहे हैं। बस फर्क, कुछ जानकारों के मुताबिक, यह है कि आजादी के दौरान की तारीखें उदारचेत्ता, समावेशी और विविधता बहुल राष्ट्र निर्माण की हैं, जबकि 2019 और 2020 का 5 अगस्त इसके विपरीत रुझान लिये हुए है। जैसा कि, देश में चोटी के बुद्धिजीवी तथा राजनीति शास्त्री प्रताप भानु मेहता ने अपने ताजा स्तंभ में लिखा, यह बहुसंख्यकवादी अहंकार और कई तबकों में कमतर होने के एहसास और आजादी सीमित होने का प्रतीक है। इस मायने में यह प्राचीन, मध्ययुगीन भारतीय परंपरा और आजादी के दौरान उपजे भारत-विचार का विलोम है। इससे भी अहम यह है कि जो राजनैतिक धाराएं अभी पिछले साल तक हिंदुत्ववादी एजेंडे के विरोध का दावा हल्के या कुछ तेज आवाज में करती रही हैं, उनके स्वर गुम हैं या स्वागत ही कर रही हैं-कुछ खुलकर तो कुछ प्रतीकों में, लेकिन विरोध के स्वर बेहद अल्पमत में हैं। इसी से नई राजनैतिक और कुछ हद नए सामाजिक ताने-बाने का संकेत मिलता है। कांग्रेस की ओर से ही कुछ थमे स्वर में कश्मीर के मसले पर और अब मंदिर के मामले में खुलकर स्वागत की आवाजें उठीं, जो खुद को मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्ववादी एजेंडे का इकलौती राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वी होने का दावा करती है। इस 5 अगस्त की पूर्व-संध्या पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का जय सियाराम का स्वागत बयान आया। अलबत्ता, यह जय श्रीराम के उद्घोष के विपरीत लोक परंपरा का आभास देता है, जिसे बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद कई बुद्धिजीवियों ने याद दिलाया था, ताकि राम के इर्दगिर्द यह नई पुरुष-सत्तात्मक आक्रामक बुनावट की काट की जा सके। लेकिन काट के लिए प्रतीक भर कारगर कम ही होते हैं। फिर तो कई कांग्रेस नेताओं के हनुमानचालिसा का पाठ भी सामने आ गया। दूसरी तमाम पार्टियों सपा, बसपा, राजद, तृणमूल कांग्रेस, बीजद, द्रमुक के बयान भी समर्थन या प्रतीकों में सहमे से विरोध के ही रहे हैं। वामपंथी पार्टियों ने सिर्फ सरकारी शिरकत का विरोध किया। प्रतिकूल मुस्लिम पक्ष रखने का बीड़ा सिर्फ एआइएमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी ने उठाया, जिसकी सियासी वजहें जानना कोई मुश्किल नहीं है। बाकी देश और अयोध्या के मुसलमान या उनके नेता तो मानो इसे नियति का खेल मानकर मौन हो गए।
एक दलील यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल फैसला सुना दिया तो इसे सबको स्वीकार कर लेना चाहिए। वैसे, कुछ न्यायविद और अन्य लोग फैसले पर अलग राय जाहिर कर चुके हैं। सर्वोच्च अदालत ने फैसला भले विवादित स्थल पर मंदिर और बगल में मस्जिद बनाने का दिया हो मगर ने
1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखने और 1992 में मस्जिद ढहाए जाने को आपराधिक कृत्य माना। इस पर लखनऊ में सीबीआइ अदालत में बयान दर्ज हो रहे हैं और उसे 31 अगस्त तक फैसला सुनाना है। फिलहाल आडवाणी, जोशी समेत सभी आरोपियों ने कहा है कि वे निर्दोष और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है। यह अलग बात है कि वे 6 दिसंबर 1992 को मौके पर मजबूत थे। लेकिन यहां मामला राजनैतिक नैरेशन का है, न कि मंदिर निर्माण का। बेशक, इस नैरेशन की कड़ी चुनावी राजनीति से भी जुड़ती है। मोदी इसके सहारे 2024 के अगले लोकसभा चुनाव और दित्यनाथ इसी के सहारे 2022 के विधानसभा चुनाव में अपनी नैया खे ले जाने का एजेंडा बना चुके होंगे, वरना भाद्र मास और वषार्काल में देव-विश्राम के समय शास्त्र वर्जित शुभ कार्य के तर्क आधुनिक दौर की राजनीति ही हो सकती है। योजना के मुताबिक, मंदिर 2022 तक आधा और 2024 तक पूरा तैयार हो सकता है। लेकिन बाकी दलों को भी चुनावी पेशबंदी मंदिर का समर्थन करने या मौन बनाए रखने को बाध्य कर रही होगी, वरना आडवाणी का रथ बिहार में रोकने वाले लालू प्रसाद यादव की राजद के सुर आज क्यों बदले हैं और उत्तर प्रदेश में 1990 में अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद की पहली कार सेवा पर पाबंदी लगाने वाले मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा ही क्यों मौन रहती। दोनों ही पार्टियों में कमान नई पीढ़ी क्रमश: तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव के हाथ आ गई है। बसपा की मायावती ने भी पहले दलित पुजारियों की गैर-मौजूदगी का मुद्दा उठाया, फिर राम के हवाले से समावेशी संस्कृति की बात भर की। चुनाव बंगाल में भी होने हैं। सो, ममता बनर्जी ने भी राम के हवाले से सधा-सा बयान दिया। यह बताता है कि नए राजनैतिक नैरेशन की ताकत आज क्या है, जो सबको समर्पण करने पर बाध्य कर रहा है। यह फर्क तब और साफ सुनाई पड़ सकता है, जब आप 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के वक्त को याद करें। तब मुलायम, लालू या ऐसे तमाम नेता खम ठोंककर मंदिर आंदोलन के लाफ बोलते थे और उनकी बात सुनी जाती थी। बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा-बसपा गठजोड़ को बहुमत मिला और उनका नारा ही था मिले मुलायम-कांशीराम हवा हो गए जय श्रीराम। आज वैसा नारा शायद ही कोई लगा पाए । बेशक, इस दौर परिवर्तन में तमाम भाजपा विरोधी पार्टियों की भी अपनी अहम भूमिका गिनाई जा सकती है। न सिर्फ धर्मनिरपेक्षता पर इन दलों ने अजब-गजब तेवर अपनाए, बल्कि पहचान और वोटबैंक की राजनीति के साथ-साथ सरकारों में निकम्मापन और भ्रष्टाचार के किस्से भी लोगों के मोहभंग का कारण बने। लिहाजा, 2014 में भाजपा और एनडीए की सरकार बनने के बाद संघ परिवार का नैरेशन जोर पकड़ने लगा और 2019 के चुनावों में उससे भी बड़ा बहुमत हासिल करके उसने हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद और राम के अपने नैरेशन को ऐसे मुकाम पर पहुंचाने में कामयाबी पाई कि अब बाकी पार्टियों के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। बहरहाल, यह नैरेशन सिर्फ राजनीति में ही नहीं बदला है, बल्कि साहित्य खासकर पॉप साहित्य में भी इस तरह की व्याख्याएं युवा पीढ़ी को लुभा रही हैं। अंग्रेजी से आया यह फैशन हिंदी में परवान चढ़ने लगा है और कई युवा लेखक राम, शिव और पौराणिक पात्रों को नए जमाने के मुताबिक ढालकर किस्सागोई करने लगे हैं। लेकिन एक बात तो तय है कि ये राम तुलसीदास के गरीबनवाज और कबीर के
घट-घट व्यापी राम से कुछ अलग हैं, जहां भव्यता ही लुभाती है। संभव है, जनमानस में राम की पुरानी लोकहितैषी छवि लौट आए, जो बकौल तुलसी उनके हृदय में बसते हैं जिन्हें जात-पात धन धरम बढ़ाई नहीं सुहाती। लेकिन मौजूदा राजनैतिक वातावरण तो कुछ और ही कहता है।