नई महामारी ब्लैक फंगस का डरावना फंदा

महामारी कोविड-19 की प्रचंड दूसरी लहर से तो गोपालगंज, बिहार के 40 वर्षीय अतुल श्रीवास्तव बच गए मगर एक ऐसी बीमारी के जानलेवा चंगुल में फंस गए, जिसे हाल तक खास चर्चा के लायक नहीं माना जाता था और जिसके बिरले मरीज ही अस्पतालों में पहुंचते थे। अतुल ब्लैक फंगस (म्यूकोरमाइकोसिस) के शिकार होकर अपनी एक आंख गंवा चुके हैं और अब लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमसी) में मौत से जूझ रहे हैं। अब तक सात लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर चुके उनके 70 वर्षीय पिता राजेंद्र श्रीवास्तव बताते हैं कि पटना के डॉक्टरों ने जवाब दे दिया तो इस उम्मीद में लखनऊ पहुंचे कि शायद अतुल के दो मासूम बच्चों की दुआ लग जाए और उनका जवान बेटा ठीक हो जाए।

प्रशांत श्रीवास्तव

महामारी के प्रकोप से तो अब दूर देहात कराह उठे हैं, जो पिछले साल पहली लहर में सुरक्षित थे। गंगा में तैरती और रेत में दफन लाशें इसकी गवाह बन गई हैं। इस बीच ब्लैक फंगस नामक नई आफत का साया देश में तेजी से पसरता जा रहा है। फिलहाल ब्लैक फंगस के शिकार लोगों का आंकड़ा 11,717 दर्ज हो चुका है, जो जाहिर है कोरोना के अब सक्रिय जानलेवा म्युटेंट के शिकार लोगों के आंकड़ों की तरह बेहद नाकाफी हो सकता है। यानी इसके शिकार भी दर्ज आंकड़ों से काफी ज्यादा हो सकते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक ही इनमें से 219 (25 मई तक) लोगों की मौत हो चुकी है। मामले इतनी डरावनी रफतार से बढ़ रहे हैं कि 20 मई को केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र लिखकर कहा कि वे ब्लैक फंगस को महामारी घोषित करें। हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान, ओडिशा, बिहार, चंडीगढ़, उत्तराखंड, तेलंगाना समेत करीब 14 राज्य इसे महामारी घोषित कर चुके हैं। ब्लैक फंगस का सबसे ज्यादा प्रकोप गुजरात और महाराष्ट्र में है, जहां 23 मई तक 4000 से ज्यादा मामले आ चुके हैं। इसके बाद आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा और बिहार में मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। असल में ब्लैक फंगस कोई नई बीमारी नहीं है, न ही यह एक से दूसरे व्यक्ति को लगने वाली संक्रामक बीमारी है, जैसा कि दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने हाल ही में बताया। यह कोरोना के दौर में इलाज में बरती जा रही लापरवाही और नासमझी का ही नतीजा है। यह उस आपराधिक लापरवाही, उपेक्षा और अराजक व्यवस्था का भी नायाब नमूना है, जो लोगों की जान पर बन आई है। इससे यह भी पता चलता है कि सरकारी तंत्र का रवैया ही चलताऊ नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य और चिकित्सा तंत्र भी बस राम भरोसे चल रहा है, वरना कोविड-19 के लिए इलाज का कुछ तो प्रोटोकॉल अब तक तय हो जाना चाहिए था, जो नहीं हो पाया। लगता है सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को कोई फिक्र नहीं है और निजी क्षेत्र को पैसे कमाने से फुर्सत नहीं है, जो सरकारी तंत्र से बड़ा हो गया है। होना तो यह भी चाहिए था कि सरकार इलाज के पुख्ता प्रोटोकॉल के लिए विशेषज्ञों से राय-मशविरे के बाद संदेश जारी करती। लेकिन सरकार को तो न पहली लहर के वक्त पहले से सावधानी बरतने की फिक्र थी, न दूसरी लहर की चेतावनियों पर ध्यान देने की फुर्सत थी। दूसरी खतरनाक लहर की चेतावनियां नवंबर-दिसंबर में आ गई थीं लेकिन जनवरी और फरवरी में प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शेखी बघार रहे थे कि हमने कोविड पर विजय पा ली और दुनिया को राह दिखा दी। स्वास्थ्य मंत्री हर्षबर्धन 7 मार्च को कह रहे थे कि भारत में कोरोना अब खत्म होने की ओर है। केंद्र सरकार की सबसे बड़ी गड़बड़ी तो कोविड वैक्सीन के मामले में दिखती है, जिस पर अगले पन्नों में विस्तृत रपट है, जो बताती है कि कैसे देश में टीकाकरण नाकाम हो चुका है। देश में लोगों की जिंदगी से कैसा खिलवाड़ चल रहा है, यह इससे भी जाहिर है कि ब्लैक फंगस की दवा उपलब्ध कराने के लिए दिल्ली हाइकोर्ट से उसी तरह गुहार लगाई गई है, जैसे आॅक्सीजन और रेमडेसिविर के इंजेक्शन उपलब्ध कराने के लिए कुछ हफते पहले हुआ था। ब्लैक फंगस की दवा एम्फोटेरिसिन-बी की अब देश भर में कालाबाजारी की खबरें भी उसी तरह हैं, जैसे कोविड के मामले में रेमडेसिविर की। कौन ज्यादा जोखिम में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट तथा ब्लैक फंगस वार्ड में मरीजों का इलाज कर रहे डॉ. आलोक अग्रवाल कहते हैं, अभी तक जो मामले सामने आ रहे हैं, उनमें ऐसे मरीज ज्यादा हैं जिन्हें जरूरत से ज्यादा स्टेरॉयड की डोज दी गई है, या फिर जिन्होंने प्रतिदिन की डोज तो सही ली है लेकिन तय दिनों से ज्यादा स्टेरॉयड का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा ऐसे कोविड-19 के मरीज हैं जिनका इलाज के दौरान ब्लड शुगर अनियमित रहा है। इन मरीजों के अलावा अस्थमा से पीड़ित और कैंसर का इलाज करा रहे मरीज ज्यादा जोखिम में हैं। डॉ. प्रशांत का कहना है, ब्लैक फंगस हमेशा वातावरण में मौजूद रहता है। लेकिन वह अभी तक ज्यादा लोगों को शिकार इसलिए नहीं बना पा रहा था क्योंकि कि लोगों की इम्युनिटी बेहतर थी। लेकिन जो लोग कोविड-19 वायरस से संक्रमित हुए, उनकी इम्युनिटी कमजोर हो गई है। इसके अलावा, कोविड- 19 मरीजों के इलाज में स्टेरॉयड धड़ल्ले से इस्तेमाल किया गया है। इससे न केवल लोगों का ब्लड शुगर लेवल अनियमित हुआ, बल्कि उनकी इम्युनिटी और कमजोर हो गई। वे कहते हैं, एक अहम बात आॅक्सीजन के इस्तेमाल को लेकर भी हुई क्योंकि बिना किसी निगरानी के भी बड़ी मात्रा में आॅक्सीजन का इस्तेमाल लोगों ने किया है। ऐसे में उसमें इस्तेमाल होने वाले पानी से भी संक्रमण बढ़ गया। कई मामलों में लोगों ने डिस्टिल्ड वॉटर की जगह सामान्य पानी का इस्तेमाल किया। इस कारण भी फंगस को फैलने का मौका मिल गया।

ब्लैक फंगस का बढ़ता प्रकोप

इस तरह यह गंभीर खतरा बन आया है कि ब्लैक फंगस के मामले उसी तरह उछाल लेने लगें, जैसे कोविड-19 संक्रमण के। अभी जो मामले सामने आए हैं, उनमें ब्लैक फंगस ज्यादातर ऐसे लोगों को हो रहा है जो कोविड-19 के संक्रमण से ठीक हो चुके हैं या फिर उन्हें डायबिटीज है। ये दोनों बीमारियां इस समय भारत में घातक स्थिति में हैं। इस समय 2.67 करोड़ लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। फिर, भारत में डायबिटिज के करीब 8 करोड़ मरीज हैं, जो दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा संख्या है। एल्सवेयर जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार इस समय देश में ब्लैक फंगस के 80 फीसदी मामले उन कोविड-19 पॉजिटिव मरीजों के हैं, जिन्हें डायबिटीज है। जाहिर है, खतरा बड़ा है। ब्लैक फंगस का एक खतरा और भी बड़ा है। वह यह है कि इसमें मृत्यु दर कोरोना के मुकाबले कहीं ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार गंभीर स्थिति में मरीज के पहुंचने पर मृत्यु दर 30-50 फीसदी तक पहुंच जाती है। ऐसे में जब कोरोना से ऐसी स्थिति बन गई कि श्मशान और कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार की जगह नहीं मिल रही है तो ब्लैक फंगस के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई तो स्थिति बहुत भयावह हो सकती है। खास तौर से लगभग शून्य ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे के मद्देनजर आने वाली स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के नोएडा में कैलाश अस्पताल के कोविड केयर सेंटर के इंचार्ज डॉ. प्रशांत राज गुप्ता कहते हैं, अभी तक देश के 14 राज्यों ने ब्लैक फंगस को महामारी घोषित किया है। ये सभी राज्य घनी आबादी वाले हैं। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि ब्लैक फंगस के इलाज के लिए ग्रामीण स्तर पर अस्पताल या अस्पतालों में बेड की व्यवस्था कराई जाए। इसके अलावा दवाओं की उपलब्धता भी बढ़ाई जाए और सरकार इसका इंतजाम करे। दरअसल इसका इलाज काफी महंगा है, जिसे ग्रामीण आम आदमी की जेब शायद ही बर्दाश्त कर पाए। अभी ही बाजार से दवाओं की किल्लत की खबरें आ रही हैं। यह अच्छा संकेत नहीं है। दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के नाक-कान-गला रोग विभाग के प्रोफेसर डॉ.गौतम बीर सिंह कहते हैं कि ब्लैक फंगस के प्रकोप की रोकथाम के लिए बेहद जरूरी है कि कोरोना से ठीक हुए मरीजों पर नजर रखी जाए। इसके लिए सरकार को निगरानी प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत है, जिसमें प्रत्येक संभावित मरीज की 7-10 दिनों में जांच की जाए, पता चलते ही उसका इलाज शुरू हो सके। अगर ऐसा होता है तो ब्लैक फंगस की रोकथाम कहीं ज्यादा आसान हो जाएगी। यह इसलिए भी आसान है क्योंकि कोविड-19 पॉजिटिव हो चुके मरीजों का आंकड़ा सरकार के पास उपलब्ध है।

दवा की कालाबाजारी

ब्लैक फंगस का इलाज एम्फोटेरिसिन-बी से किया जाता है और यही दवा पूरी दुनिया में चलती है। लखनऊ में अतुल का इलाज करा रहे उनके पिता राजेंद्र बताते हैं कि बाजार में जिस दवा की कीमत 7-8 हजार रुपये के करीब है, वह मुझे 30 हजार रुपये में खरीदनी पड़ी। तीन लाख रुपये तो केवल इंजेक्शन में चले गए। डॉ. गौतम कहते हैं, ब्लैक फंगस का इलाज कोविड-19 की तरह अबूझ नहीं है। इसके इलाज के प्रोटोकॉल तय हैं। एम्फोटेरिसिन- बी डॉक्टर की निगरानी में दी जाती है। लेकिन यह दवा भी बाजार से गायब होती जा रही है। सरकार को तुरंत कदम उठाने चाहिए। मई 2021 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में छह दवा कंपनियों ने हर महीने एम्फोटेरिसिन-बी के करीब 1.63 लाख वॉयल का उत्पादन किया है। 23 मई तक देश में ब्लैक फंगस के 8 हजार के करीब मरीज सामने आ चुके हैं। ऐसे में इन्हीं मरीजों के लिए यह उत्पादन पर्याप्त नहीं है। डॉ. आलोक बताते हैं, इसका इलाज काफी जटिल है। ऐसे में एक दो वॉयल से काम नहीं चलता है। कई बार तो एक मरीज को 100 वॉयल तक देनी पड़ती है।” साफ है कि एक मरीज को ब्लैक फंगस के इलाज के लिए औसतन 50-60 वॉयल की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में मौजूदा उत्पदान क्षमता पर्याप्त नहीं है। मांग बढ़ने की वजह से अब कालाबाजारी भी शुरू हो गई है। स्थिति कैसे बदतर हो रही है उसे मध्य प्रदेश में एम्फोटेरिसिन-बी की हो रही किल्लत से समझा जा सकता है। राज्य में मरीजों की संख्या सरकार के अनुमान से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। दवा नहीं मिलने और इलाज की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ रही है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के हिसाब से रोजाना करीब 1500 एम्फोटेरिसिन-बी वॉयल की जरूरत है, लेकिन वह नहीं मिल पा रही है। एम्फोटेरिसिन-बी की किल्लत के बारे में मध्य प्रदेश के संबंधित विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि इंजेक्शनों का उत्पादन तेजी से बढ़ाने को लेकर कंपनियों से बात हुई है। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने आपूर्ति भी बढ़ाई है। मध्य प्रदेश सरकार ने इस माह की शुरूआत में आठ मेडिकल कॉलेजों में 400 से अधिक बेड आरक्षित कर दिए थे। मध्य प्रदेश में ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों का इलाज पूरी तरह मुफत करने का ऐलान किया गया है। भोपाल और जबलपुर में इलाज का सेंटर भी बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश जैसा हाल हरियाणा का भी है। वहां रोजाना औसतन 60 नए संक्रमित सामने आ रहे हैं। जैसे-जैसे राज्य में मामले बढ़ रहे हैं, दवा का संकट बढ़ता जा रहा है। हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज के अनुसार, केंद्र सरकार ने 31 मई तक के लिए हरियाणा के कोटे के तहत एम्फोटेरिसिन-बी की केवल 100 वॉयल दी हैं जबकि हमने स्थिति को देखते हुए 12 हजार वॉयल की मांग की थी। हमने दवा के लिए ग्लोबल टेंडर जारी कर दिए हैं। साथ ही प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेज में 20 बेड भी रिजर्व कर दिए हैं। एम्फोटेरिसिन-बी वॉयल की किल्लत इस तेजी से बढ़ रही है कि राजस्थान में मामला न्यायालय तक पहुंच गया है। हाइकोर्ट में वकील सिद्धार्थ जैन की जनहित याचिका में पूछा गया है कि इंजेक्शन के अभाव में मरीज की मौत होती है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? मरीज के परिजनों को ऐसे हालात में मुआवजे दिया जाना चाहिए। ऐसा ही हाल गुजरात और महाराष्ट्र का है। इन दोनों राज्यों में 2000 से ज्यादा (23 मई तक) ब्लैक फंगस के मामले आ चुके हैं। इस बीच महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कहा है कि एक मरीज को औसतन 60 से 100 वॉयल लग रही हैं। मौजूदा मामलों के देखते हुए औसतन डेढ़ लाख वॉयल की जरूरत पड़ सकती है। अगर इतने वॉयल नहीं मिले तो मरीजों की जान पर खतरा बन जाएगा। बढ़ती किल्लत के बीच अब केंद्र सरकार का बयान आया है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्यमंत्री मनसुख मंडाविया ने 20 मई को कहा “ब्लैक फंगस या म्यूकोरमाइकोसिस के इलाज में उपयोगी दवा एम्फोटेरिसीन-बी की कमी के मुद्दे का जल्द समाधान किया जाएगा। तीन दिनों के भीतर पांच और दवा कंपनियों को भारत में दवा बनाने की मंजूरी दी गई है। ये कंपनियां मौजूदा छह दवा कंपनियों के अलावा हैं।”मंडाविया ने कहा कि मौजूदा दवा कंपनियों ने दवा का उत्पादन बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसके अलावा भारतीय कंपनियों ने एम्फोटेरिसीन-बी की छह लाख खुराक के आयात के लिए भी आर्डर दिए हैं। हम स्थिति सामान्य करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एमक्योर फार्मास्युटिकल्स, नैटको फार्मा, गुफिक बायोसाइंस, एलेम्बिक फार्मास्युटिकल्स और लाइका फार्मास्युटिकल्स को हाल के दिनों में एम्फोटेरिसीन- बी के उत्पादन के लिए मंजूरी मिली है। माइलान, बीडीआर फार्मा, सन फार्मा और सिप्ला जैसी कंपनियां पहले से ही इस दवा के उत्पादन में लगी हुई हैं। अगर कंपनियां उत्पादन बढ़ा लेती हैं तो भी फौरी राहत नहीं मिलने वाली है, क्योंकि घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात होने वाली एम्फोटेरिसीन-बी जून और जुलाई तक ही मिल पाएगी। हालांकि जुलाई तक कुल उपलब्धता 11 लाख वॉयल तक पहुंचने का अनुमान है। जून में इसके पांच लाख के करीब रहने का अनुमान है। कोरोना की तरह ब्लैक फंगस में भी जो सबसे बड़ी चुनौती उभर रही है वह उसका छोटे शहरों और गांवों में पहुंचना है, क्योंकि जब शहरों में हालात इतने बदतर हैं तो गांवों में स्थिति और भयावह हो सकती है। ?

ब्लैक फंगस क्या है?

नाक से काले रंग का म्यूकस निकलना, बुखार आना, चेहरे का एक तरफ से सूज जाना, सिरदर्द होना, नाक बंद होना, आंख से धुंधला दिखना, उल्टी आना, सीने में दर्द होना, साइनस कंजेशन, मुंह के ऊपरी हिस्से या नाक में काला घाव होना इसके अहम लक्षण हैं। फंगस जब ब्लैक पिगमेंट प्रोड्यूस पैदा करता है तो उसे ब्लैक फंगस कहते हैं। जब फंगस पिगमेंट नहीं पैदा करता तो वह व्हाइट हो जाता है।

व्हाइट फंगस क्या है?

कैंडिडा नाम के फंगस से होने वाले संक्रमण को कैंडिडिआसिस (व्हाइट फंगस) कहते हैं। ये आम तौर पर त्वचा और शरीर के अंदर जैसे- मुंह, गले, महिलाओं के गुप्तांग में बिना कोई समस्या किए पैदा हो जाते हैं। जब ये बहुत तेजी से फैलना शुरू होते हैं और शरीर के आंतरिक अंग जैसे गुर्दा, दिल्ली और मस्तिष्क में पहुंच जाते हैं तब घातक हो जाते हैं।

येलो फंगस क्या है

अभी तक येलो फंगस छिपकली जैसे रेपटाइल्स वर्ग में होता था। यह जिस रेपटाइल को होता है वह जिंदा नहीं बचता है। इसलिए यह जानलेवा माना जाता है। लेकिन पहली बार यह इंसान में मिला है। इसके प्रमुख लक्षण नाक का बंद होना, शरीर सुन्न होना, शरीर में दर्द, दिल की धड़कन तेज होना, घावों से मवाद निकलना और शरीर का कुपोषित दिखना जैसे लक्षण होते हैं। बचने के लिए क्या करें फंगस संक्रमण का संबंध स्वच्छता से ज्यादा है। चाहे ब्लैक, व्हाइट या फिर येलो फंगस सभी के फैलने की एक बड़ी वजह गंदगी है। ब्लैक फंगस से बचने के लिए डॉक्टर कंस्ट्रक्शन वाली जगह से दूर रहने, धूल वाले क्षेत्र में नहीं जाने, बागवानी और खेती करते समय मास्क, पूरी बाह वाली कमीज पहनने और आर्द्रता वाली जगहों से बचने की सलाह देते हैं।

किन लोगों को ज्यादा खतरा जो लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहते हैं। इस दौरान स्वच्छता का खयाल नहीं रखने पर शरीर में फंगस के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। जो मरीज आॅक्सीजन या वेंटिलेटर पर हैं, कोरोना से ठीक हो चुके मरीज, डायबिटीज से पीड़त, कैंसर का इलाज करा रहे मरीज, कमजोर इम्युनिटी वाले, जिन्हें ज्यादा स्टेरॉयड दी गई है, उनमें संक्रमण का ज्यादा खतरा होता है।